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अखबार बेंच कर आया हूँ

हथियार बेंच कर आया हूँ

आग उबलती खबरों का मैं

बाज़ार बेंच कर आया हूँ

किसने कैसे कितना खाया

किस मंत्री ने कितना पाया

अगले मुख्य चुनावों का मैं

दावेदार बेंच कर आया हूँ

फ़िल्मी जगत की ताज़ी बातें

IPL की जागी रातें

छोटे-बड़े पूंजीपतियों के

कारोबार बेंच कर आया हूँ

गली मुहल्लों के फर्जी कॉलेज

नन्हों को A+ की knowledge

अधनंगी तस्वीरों का मैं

भण्डार बेंच कर आया हूँ

चालीस पन्नों की चालीसा

स्थान सत्य का छोड़ा खाली सा

Real estates, car-agency, flights के

प्रचार बेंच कर आया हूँ

ckh

देखेंगे बहारें जाने दो, कब तक रुकते हैं दीवाने……..

कुछ देर यहाँ पर महफ़िल है, फिर तो होने हैं वीराने

 

हैं शोख नज़र के चर्चे आम, गज़लें हैं सारी साकी पर

साकी ही शायर की पूजा, जब तक खुलते हैं मैखाने

 

कुछ नाम जो होता तो शायद, बगिया-ऐ-मुहब्बत तक जातें

जिन गुंचा-ओ-फिजा में हीर बसे, वहाँ कौन हमे अब पहचाने?

 

हमसे है शिकायत यारों को, मिलना-जुलना सब बंद हुआ

कुछ वक़्त ही ऐसा है शायद, कैसा है क्यूँ है रब जाने ….

 

क्या नहीं खबर हमे ऐ लोगों, जो रात मचाया हंगामा

इक बूँद न पी थी ये कहने को, आये हो हमको समझाने…

जामा मस्जिद के सामने देखा एक
बूड़े बाबा को ठेले पर बेकरी बिस्किट बनाते हुए

कैसे चुप चाप भीड़ से अनजान बने
उम्र के सभी पड़ाव और उनतक साथ चले अनुभवों
को
अपने चहरे की सिलवटों में समेटे
मैदे सूजी घी और चीनी से बने चूरे को

अंगीठी में तपा मीठे स्वाद से भरे बिस्किट बनाते हैं …
रोज़ मर्रा की वही
खबरें,
दो – चार आने पर आग उबलते चाँदनी चौक के बाज़ार
कैसे इन सब में रह
कर
इन सब से दूर यहाँ खुदा के दर पर ही
पा लिए है इन बूड़े बाबा ने

ज़िन्दगी जीने का एक हसीं मकसद
उल्गलिया अंगीठी की राख से भले ही काली हो
जाती हैं
मगर हर एक बिस्किट सोने के सिक्कों सा चमकदार बन निकलता है
समय के
साथ हिन्दू – मुस्लिम में दरार दे गए सियासत वाले
और उन्छुवा नहीं हूँ मैं शायद

शायद इस लिए एक बार मस्जिद तक जाती ऊंची सीढ़ियों
से डर गया था मैं
पर
जाने इन बाबा की आँखों में तैरते जीवन के सभी मंजरों में कहाँ
खुद को देख लिया
मैंने…
प्यार से रचे एक एक बिस्किट कह गए मुझसे
खुदा के सभी तलिस्माई
किस्से
और मिटा गए ह्रदय की सतेह से सभी निरर्थक रेखाएं

ढाई सौ ग्राम सपने

आधा दर्जन सवालों के साथ

दीवार पर गड़ी खूँटी से लटका गया था कल

आज जा कर देखा तो

मीठे सपनों में चींटियाँ लगी हुई थीं

और सवालों में घुन |

सर्द सुबह की और भारी रजाई से दबा मैं
सोच में लेटा था की चाय की खोज किसने की?
नोबेल पुरस्कार उसे मिला या नहीं ?
बिस्तर पे लेटे दो चार शेर उसकी तारीफ में मार भी दिए
पर चाय भी कोई ठण्ड थोड़ी जो बिना मगाए द्वार तक आजाये
यथार्थ का बोध मन को था सो झिझक कर उठ गया
मुह धोने के लिए नल तक सकुचाता कांपते पहोच तो गया हूँ
पर काफी समय से एक उलझन में मूरत बन खड़ा हूँ
जो नल खोला तो कुरुक्षेत्र के मध्य अभिमंनु सा मैं असहाय रह जाऊँगा
हॉस्टल का गीज़र किसी महान योद्धा के वस्त्र सा टंगा
किसी अजूबा घर में रखा मानो अपनी योग्य ता बखान भर कर रहा है
उपयोगिता से उसका कोई आशय नही है
जाने कबसे यहाँ दीवार पे टंगा हम जैसे असहाय छात्रों पे इक व्यंग बना चिपका है ये
बहरहाल इस युद्ध से किसी तरह निकल
चाय की लालसा लिए ढाबे की तरफ कदम अब बढ़ चले हैं
बादलों या शायद धुंध की परत में छिपा सूरज
और समय का बदलना केवल घडी की धरातल पर
पहर का बोध करने गरज न रही सूरज में अब
और इस बीच ओस की बूंदों का
सूरज की रोक-टोक के बिना जमीन पर अटखेलियाँ खेलना
वो मजदूर किस तरेह ढाबे की चाय में जीवन पा रहा है?
ये महिलाएं फूल तोडती ईश्वर आराधना में लीन मानो कुछ यथार्थ से अपरिचित
या कह लो अविचलित कैसे यूँ हंस देतीं हैं और सखी का हाल पूछ बैठती हैं ?
ऐसे मौसम में भला किसी मानव का क्या हाल हो सकता है ?
शायद छात्र शरीर ज्यादा सुकोमल हो सोच कर मुह फेर लेता हूँ
ढाबे पे वो छोटा बच्चा कैसे उन बर्तनों को धो रहा है?
इक फटा पुराना स्वेटर और एक टोपा
चाय की लालसा उसके चेहरे पर नही दिखती
न रहा गया जा हंस कर पूछ दिया मैंने -
” मुन्ना घर से इतनी जल्दी काम पर आगये ? ठण्ड नही लग रही क्या ?”
” घर नही है मेरा कोई, यहीं रहता हूँ ..काम नही करूंगा तो खाना नही मिलेगा सर “
कह कर वो फिर से अपने कर्म भोमी का अर्जुन बन गांडीव उठाये मानो चल पड़ा
स्तब्ध कुंठित स्वर में ईशवर से आत्मा ने मानो कुछ कहा, पर मैं सुन न सका
और बिना चाय पिए हॉस्टल वापस लौट आया
जीवन की लयबद्ध धारा में मानो इस सुबह ने विराम सा लगा दिया हो
एक तीव्र स्वर की गूँज ने झकझोर कर रख दिया है मानो
अपनत्व के बीच इक खोखलेपन का अनुभव कर रहा हूँ
उस जैसे बालक के लिए मैं दीवार पे टंगे
एक खराब गीज़र सा नही तो और क्या हूँ ?
भावनाओं की परिधि पर एक ही प्रशन फेरे लगा रहा है
और मेरी अभिव्यक्ति की क्षमताओं पर एक उपहास बने खड़ा है

जिन दिनों उम्र पर तन्हाई का बुखार था
टूटता शरीर और ह्रदय तार-तार था
चिलचिलाती धुप में छाँव ढूंढ रहा था मैं
वीरानी पड़ी बस्तियों में गाँव ढूंढ रहा था मैं
मेरे हर इक स्वप्न पर वक़्त का प्रहार था
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

रक्त-लेप भाल पर
मैं समय की ताल पर
गर्त नापता गया
अंतर झाँकता गया
समाज रुष्ट जब हुआ मेरे हर सवाल पर
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

स्वाभिमान हार कर असहाय था जब पड़ा
जागता था रात-रात, शोक था जब बड़ा
साँस-साँस में एक बस ही पुकार थी
हार स्वीकार थी, मौत की गुहार थी
निर्वस्त्र बीच बाज़ार में सर झुका था मैं खड़ा
उन दिनों तुम न थे
हाय! तब तुम न थे

दोष शास्त्र ने मढा जब हाथ की लकीर पर
कुंडली भी हंस पड़ी जब भाग्य के फ़कीर पर
न कोई जब विकल्प था
चला लिए संकल्प था
जब हँसा वो योद्धा मेरे खाली तुनीर पर
हाय! तब तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

 अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धुप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

प्राण कंठ तक आ पहुंचें हों
भाव मुखरित न होते हों
प्यासा हो मन पाने को प्रिय को
बैरी नयन धुंधला जाएँ

   शिथिल पड़त मेरा शरीर हो
धमनियों में हो मद्धम रक्त प्रवाह
बीते पल सब एक एक करके
मस्तिष्क पटल पर छा जाएँ

चित्त चिता की राह ताकता
मृत सैया पे लेटा हो
आगे बढ़ कर दाग दे कोई
धुवां राख सब हो जाए

 अंतिम दिन जीवन के यदि ये
पीर हृदय की रह जाए
के दौड़-धुप में बीत गए पल
प्रियतम से कुछ ना कह पाएँ

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